Sunday, November 9, 2008

एक पेंच

उसकी मम्मी कहती थी
अक्सर
कि
उसका बेटा किसी खिलौने
से
नहीं खेलता है ज्यादा समय
बस
उसके लिए क्षणिक आकर्षण भर होता है
वह खिलौना
फिर ना जाने क्यूं उस खिलौने
के पुर्जे-पुर्जे अलग करने में
उसका मन ज्यादा लगता है
और
मैं कहता हूं कि
शायद उसका बेटा
ना जाने क्या
उन खिलौने के पुर्जे-पुर्जे
में ढूढता था,
कोई 'एक पेंच'
जो उन खिलौनों को
आपस में जोड़ सकता था
और
वह 'पेंच'
शायद उस परिवार से
गायब था.

Friday, November 7, 2008

आ(रा)मदेव बाबा और हमारे शरीर की बनावट्

मेरा लगभग 21 माह का बेटा 'र' नहीं बोल पाता इसलिए कहता है---- आमदेव बाबा, सो मैं भी वही

लिख रहा हूं। यूं रामदेव बाबा को 'आमदेव' कहने के अपने खतरे हैं। रामदेव बाबा व्यायाम द्वारा देश को

स्वास्थ्य लाभ कराते हैं जबकि 'आमदेव बाबा' बनकर न जाने हम कितने गरिष्ट भोजों का स्वाद ले

लेकर उसे पेट क़ॆ क़ुएं में डालते चले जाते हैं।

बचपन में एक विज्ञापन देखा करता था जिसमें मास्टर जी कहते थे---'बच्चों ये है हमारे दॉतों की बनावट ----डाबर लाल दंत मंजन' सो उसकी तर्ज पर जब आज अधिकांश व्यक्तियों के शरीर

की बनावट देखता हूं तो घबरा उठता हूं और सुबह- सुबह आस्था चैनल लगाकर स्वास्थ्य बनाने की इच्छाशक्ति को

बढ़ाने की भरपूर कोशिश करता हूं।

टी.वी.का बटन ऑन करते ही बाबा की मुद्राएं और उनका हँसता मुख देखकर क्रतार्थ हो उठता हूं मानो

'बाबा' ने नहीं स्वयं मैंने ही समस्त व्यायाम कर लिए। देश से विदेश तक 'योग' को 'योगा' के रूप

प्रचारित कर बाबा ने सभी को स्वास्थ्य रक्षा के लिए प्रेरित तो किया ही , देश की प्राचीन संस्क्रति के महत्व का गान भी किया। मैं व्यायाम कर पाऊं या नहीं पर यह तो मानता हूं कि शरीर और

मन में सीधा संबंध है। मन की बनावट सुधरेगी तो शरीर भी सुधर ही जाएगा।

अंत में पंडित भीमसेन जोशी को 'भारत रत्न ' के लिए और काश्मीरी कवि रहमान राही को 'ज्ञानपीठ पुरस्कार 'के लिए सभी ब्लौगर दोस्तों की तरफ से बधाई.

Thursday, November 6, 2008

इतिहास करवट ले रहा ..........

.....बराक ओबामा आखिर जीत गये और जीत भी ऐसी की दुनिया देखती रह गयी। भाई इतिहास को सुधारने का वर्तमान ने मौका दे दिया है। आज मार्टिन लूथर किंग कि याद आ रही है जब उन्होंने सिविल राइट्स आन्दोलन के माध्यम से श्वेत के सामने अश्वेत के अधिकारों की मांग की थी। ऐसा लगता है कि उनका देखा गया सपना आज 5 नवम्बर 2008 को साकार हो गया। हाशिये पर चाहे स्त्री हो या दलित अब समय आ गया है कि वे अपने अधिकार को हस्तगत कर सके।
ओबामा जब 20 जनवरी 2009 को कार्यभार संभालेगे उसके बाद देख्नना होगा कि काम करने का उनका नजरिया कैसा है?? क्या वे अमेरिकी दादागिरी वाली छवि से अपने-आपको मुक्त कर पाएंगे?एशिया के प्रति उनका नजरिया क्या केवल आपस मे लड्वाने का ही होगा या कोई सकारात्मक सोच होगी? इराक और अफगानिस्तान को उसके रहमो-करम पर छोड दिया जायेगा या उसके प्रति नीति मे कोइ बदलाव आएगा?? क्या वैश्विक तापमान के लिये अब भी वे गैरजिम्मेदारी वाला बर्ताव करेगे ??
सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया भारत में भी हो रही है लेकिन कभी-कभी उसका विचलन भी हुआ है. तो ओबामा के सामने दुगूनी चुनौतियां है आनेवाला समय ही बतायेगा कि वे कैसे उससे निजात पाते हैं या सामंजस्य बिठाते हैं।
बहरहाल शानदार जीत के लिये बराक ओबामा को सभी ब्लौगर दोस्तों की तरफ से बधाई.

Sunday, November 2, 2008

तुम लाजवाब हो

अनिल कुम्बले ने संन्यास ले लिया।तो भाई एक क्रिकेटर के एक युग का अंत हुआ। भला एक जख्मी खूंखार के लिये इससे बेहतर मौका भी और क्या हो सकता था?जब तक कुम्बले मैदान पर रहे अपना दबदबा कायम रखा तथा अकेले एक तरफ से वर्षों तक स्पिन बौलिग को धारदार बनाए रहा.इन विगत वर्षों में स्पिन दारोमदार लगभग कुम्बले पर ही रहा.

आज लिए गए इस फैसले में कुम्ब्ले की मंशा यही रही होगी कि आगे आनेवाले सीरीज में अपनी चोट के कारण नहीं खेल पाएंगे तो दूसरी तरफ उन्हें भविष्य की पौध से एक नई आशा बंधी होगी।

भला किसने सोचा होगा कि फिरोजशाह कोटला पर दस विकेट लेकर इतिहास रचनेवाला अपने इतिहास को अलविदा भी उसी कोटला से करेगा।

आज भी याद है कुम्बले का वेस्टइंडिज में टूटे जबडे से बौलिंग करना और एक बार फिर उन्होंने अपने अंतिम टेस्ट में घायल होने के बावजूद वही जज्बा कायम रखा।

भविष्य की शुभकामनाऍ.

Saturday, November 1, 2008

बस यादें रह जाती हैं

पिछ्ले दिनों मेरी नानी का स्वर्गवास हो गया और उसके लगभग तीन महीने के बाद नाना जी भी चल बसे।न जाने कितनी यादें अपनी आखों में समेटे नानी गॉव चल पडा (मैं अक्सर "नानी गॉव" ही कहता हूं).याद आते हैं आज भी नाना जी के साथ बिताये गये क्षण जिसमे वे किस्से सुनाते थे कि कैसे सुभाष चन्द्रबोस दिखते थे तो कैसे खादी की धोती पहनने पर ब्रिटिश सरकार के द्वारा उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था. आज भी याद आती है बैठ्क में सलीके के साअथ फ्रेमिंग की गई समाचार पत्र की वह कटिंग जिसमे उन्हें सफल किसान का दर्जा दिया गया था.आज भी उनकी तरह अपनी दिनचर्या को नियमित नही कर पाया हूं.
जब भी नानी गॉव जाना होता था अक्सर आम के महीनों में या दुर्गापूजा पर तो सभी रिश्तेदार यह सोच कर भी आते कि एक-दूसरे से मुलाकत हो जायेगी.एक तरह से नाना जी हमारे परिवार की वह धुरी थे जिससे हम जुडे हुए थे.आज जब नाना-नानी नहीं रहे तो भी वहां जाते हुए कितनी बातें ,कितनी द्र्श्य आंखों के सामने आते जाते.
वहां पहुचते ही एक-एक चीज को महसूस कर रहा था.उनके द्वारा लगाये गये 12प्रकार के क्रॉटन के फूल ,5 तरह के गुलाब,6 तरह के गुडहल ,कामिनी, जैस्मिन तरह-तरह के फूलों के माध्यम से मानों मैं उन्हें देख्नने की ,महसूस करने की कोशिश कर रहा था.अपने बचे हुए समय में अक्सर वे फुलवाडी में कुछ करते दिखते थे और जब हम नानी गॉव से वापस आते तो हर कोई किसी न किसी फूल का पौधा अपने साथ लाता.मेरे लिये महज वह एक पौधा नही बल्कि नानाजी का प्यार ,आशीर्वाद होता.
वही पर इस् बार अनेक लोगों से कई बरस बाद मुलाकात हुई.बात-बात में ही आजकल की सामाजिक स्थितियों पर चर्चा शुरू हुई तो साम्प्रदायिकता से लेकर वैष्णव धर्म पर भी बातें हुईं.मेरे एक भैया जी ने बताया कि उनके यहां एक मुस्लिम परिवार है जो पूर्णतः शाकाहारी है तो दूसरी तरफ एक "पासवान बन्धु" हैं जो रोजा पढ्ते हैं बिना ध्रर्म परिवर्तन किये हुए.अक्सर ये बातें विस्म्यकारी लगती हैं लेकिन इस तरह के उदाहरण हमारे समाज मे मिलते हैं जो हमें अनायास ही आज के विद्रूप,विद्वेषित माहौल में गति प्रदान करते हैं.
नानी गॉव से लौटते हुए उनके साथ बिताया गया वह अंतिम क्षण याद आ रहा था जब अस्व्स्थ होने के बावजूद नाना-नानी से शादी के अवसर पर मुझे(हमें) आशीर्वाद मिला था. अपने रोम-रोम में उनके साथ बिताये गये क्षण को महसूस करते हुए वापस लौट आया पर इस बार कोइ पौधा साथ नहीं था.

Friday, October 31, 2008

दरख्वास्त

दोस्तों
पिछ्ले कुछ दिनों से गैर हाजिर था । पत्नी भाईदूज के अवसर पर जनकपुर अर्थात मायके गईं थी। सो मै भी उनके साथ हो लिया. तो कुछ भी खत-खुतूत न कर सका. अब आ गया तो फिर से हाजिर हूं एक और पोस्ट क़ॆ साथ .

Saturday, October 25, 2008

जाने भी दो यारों

आईये चलते=चलते देखे आज कल क्या हो रहा है-------

तो सबसे पहले हमने भी लगा ली है छ्लांग चांद के उपर -बधाई हो भाई।

दूसरी तरफ हम जमीन के नीचे भी धसे जा रहे हैं तो आप कहेंगे कैसे तो आप देख ही रहे होंगे कि मुम्बै में पिछ्ले दिनों क्या हुआ और फिर बिहार में।

मान कि उत्तर भारत वाले का रुझान अभी भी प्राईवेट नौकरीओ कि तरफ नहीं बल्कि सरकारी नौकरी की तरफ है तो फिर महाराष्ट्री भाई उस पर लट्ठ तो मत बरसाओ। जोर आजमाना है आप भी क्यू नहीं कॉपी कलम लेकर उनके साथ कुछ जोर आजमाईश कर लेते हो।जो जितेगा वही सिकन्दर.
मुम्बै मे जो हो रहा है देखकर तो बुरा लगा ही उसपर राज ठाकरे का ताल ठोकना कि दम है तो कर लो गिरफ्तार । भाई भस्मासुर् न बनो , औरों का कुछ होने वाला नहीं।ऐसा न हो कि इस हवा में तुम ही उखड़ जाओ और पता भी न चले.
कभी मुम्बै से बाहर भी निकलकर देखो पता चल जाएगा कुऍ क़ॆ मेंढक में दम कितना है..............