Friday, July 31, 2009

सॉसें जैसे रूक-रूक कर आ रही थी


आज 'अथर्व' का

प्ले-स्कूल का चौथा दिन

पहले,दूसरे और तीसरे दिन

तो वह हमारे साथ गया

सो

ना-नुकूर करते

चला ही गया,

चौथे दिन उसे वैन में जाना था

हम दोनों सहमें हुए थे

आखिर

वह समय आ गया

वैन के पास हम दोनों खड़े

'अथर्व'

अपनी मिमी-मॉ की गोदी में

मैंने कहा

बेटा जाओ वैन में

वह अपनी मिमी-मॉ सॆ

चिपट गया

और कहा

नहीं

मैंने एक नजर वैन के

अन्दर डाली

ओफ!!!

ढाई-तीन साल के छोटे-छोटे

बच्चे मुझे नजर आये

जिनका चेहरा

लाल सुर्ख गुलाबी

सबकी ऑखों में मुझे लगा


अपने मन को मैंने

मजबूत किया यह दिलासा दिलाते हुए

कि

और भी तो बच्चे जाते हैं

जो

अवि(अथर्व) की तरह

ही

तो है

फिर 'अथर्व' को कहा

बैठो बेटा

वह बैठ गया

यह कहते कि

अब 'अवि' नहीं रोएगा

वैन चल दी

लेकिन

ऐसा लगा कि

हम तीनों की सॉसें

जैसे

रूक-रूक कर आ रही हो

हम दोनों लौट पड़े

एक-दूसरे की

ऑखों को देखा

लेकिन

निःशब्द!!




Saturday, December 6, 2008

खामोश!!ब्रेकिंग न्यूज जारी है..

आज भारतीय इलेक्ट्रौनिक मीडिया अपनी बेबाकी के लिए खुद को कठघरे में खड़ी पा रही है। मुम्बई के हादसे ने एक बार पुनः मीडिया के स्वतंत्र चरित्र पर सवाल खड़ा कर दिया है कि स्वतंत्रता एवं उच्छ्र्खलता में वहॉ विभेद है या नहीं?

क्या इलेक्ट्रौनिक मीडिया का बाजार केवल ''ब्रेकिंग'' तक ही टिका हुआ है या उससे आगे भी उसकी कोई जिम्मेदारी है।इससे कौन इनकार कर सकता है कि भारत के साथ -साथ विश्व आतंकवाद के इस रूप को लेकर चिंतित हैं लेकिन इलेक्ट्रौनिक मीडिया पुनः अपनी वही न्यायाधीश वाली भूमिका में नजर आई है।इधर मुम्बई पर हमला हुआ और उधर इलेक्ट्रौनिक मीडिया ने इस हमले में पाकिस्तान को घसीटना शुरू कर दिया।

हॉ, बाद में यहाँ प्रमाण जरूर मिलने लगा कि लश्कर के साथ-साथ आई।एस.आई. की भी इस नापाक इरादे में शामिल होने संभावना है जिसकी पुष्टि भारत सरकार की तरफ से होना बाकी थी.

तो इलेक्ट्रौनिक मीडिया चाहती क्या है? क्या ''ब्रेकिंग न्यूज'' आज हमारे एवं मीडिया इंडस्ट्री के लिए इतनी जरूरी हो गयी है कि इसकी प्रतिस्पर्धा में वे थोड़ा सा भी परहेज नहीं कर सकते कि इस तरह की बयानबाजी से उनकी साख पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

भाषा के स्तर पर कम-से-कम जजमेंट वाली भाषा का प्रयोग उसी क्षण तो नहीं ही किया जाना चाहिए था। जब कोई भी एसी जजमेंटल भाषा का प्रयोग करता है तो उसक प्र्भाव व्यापक होता है और जब मीडिया केवल अपने ब्रेकिंग न्यूज की खातिर यह करने लगे तो उसकी साख पर बट्टा लगना स्वाभाविक है।

आज ''ब्रेकिंग न्यूज'' का आलम यह है कि आधे घंटे में एक नयी ब्रेकिंग न्यूज हमारे सामने हाजिर होती है और यदि कहीं हमें किसी चैनल पर यहाँ नहीं दिखती है तो तुरंत हम किसी दूसरे चैनल की तरफ का रूख करते है । मसलन कि हमारे समाज को अब ब्रेकिंग न्यूज की लत हो गई है जो उसकी संवेदनशीलता को खंडित कर रही है।खंडित इस रूप में कि कोई भी ब्रेकिंग न्यूज उसके लिए मनोरंजन एवं सनसनाहट का साधन भर बन गयी है.

आज ''ब्रेकिंग न्यूज''के बहाने इलेक्ट्रौनिक मीडिया इसी चीज को हमारे सामने रखकर अपने बाजार को गर्म कर रही है।तभी तो आपको वो यह भी बताती है कि उसके चैनल का कैमरा किसी घटना विशेष को कितना कवर कर रहा है ताकि आप उससे चिपके रहे।

लेकिन क्या मीडिया का उत्तरदायित्व किसी घटना को कवर करना,ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर हमारे सामने पहुंचाना ही एक अहम लक्ष्य है और उसके आगे कुछ नहीं?

भारतीय मीडिया को बड़े ही गंभीर रूप से भारत के बाहर लिया जाता है।लेकिन उसके ब्रेकिंग न्यूज के लिए नहीं बल्कि समय के साथ-साथ चलने के लिए. आज इलेक्ट्रौनिक मीडिया समय की धड़कन एवं समाज के नब्ज को एक साथ लेकर चल रही है.

लेकिन खलल उत्पन्न तब होता है जब दोनों को संतुलित करने वाला तत्व 'उत्तरदायित्व' गायब हो जाता है।

पाकिस्तान में तो जी अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन हुए जब उसकी इडस्ट्री खुली हवा में पॉव पसार रही है लेकिन हमारी ब्रेकिंग न्यूज की करतूत की वजह से आज वह भी आप पर पत्थर फेंक रहे हैं।

इसलिए इन ब्रेकिंग वालों से आग्रह है कि वे किसी जजमेंट पर पहुंचने से पहले आखिर थोड़ा ठहरकर सोच लें कि वो क्या कहने जा रहे हैं और उसका प्रभाव क्या होने जा रहा है।

साथ ही भाई ये क्या मजाक एक तरफ कमांडो अपनी कारवाई कर रहे है और दूसरी तरफ आप उसका लाइव कवरेज दिखा रहे हो फिर आधिकारिक हस्तक्षेप के बाद आप उसका डेफर्ड लाइव दिखाते हो।बंधु इतना तो जानते हो कि कमांडो एक्शन को लाइव दिखाकर आप किसकी मदद कर रहे थे?भाई वो तो कोई अभ्यास तो था नहीं लेकिन आपलोगों ने उसे युद्धाभ्यास की शक्ल दे दी.

आप मीडिया वाले कुछ बोलते क्यों नहीं????????????

Sunday, November 30, 2008

नो फाइट बैक

मुम्बई में होने वाले आतंकवादी घटना के बाद चारों तरफ यह चर्चा चल रही है कि इस घटना की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? हमारे राजनेता क्या समस्या के प्रति गंभीर नहीं हैं तथा ऐसी घटना घटित होने के बाद उस पर पुन: सोचते नहीं कि इसका समाधान क्या हो सकता है? दूसरी तरफ कारगिल के समय भी खुफिया तंत्र की नाकामी पर संसद में जोर-शोर से बहस तो हुई थी।लेकिन उससे भी सबक नहीं लिया गया. तो ऐसी बह्स का क्या अर्थ ? फिर विश्व समुदाय हमारी संसद में होने
वाली कार्यवाही को किस रूप में याद रखती होगी यह भी आज सोचने की बात है।
क्या इस बार भी खुफिया तंत्र को इस तरह की जानकारी नहीं थी और अगर रॉ जैसी संस्था को यह जानकारी थी और उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से इसे शेयर किया तो आगे उसपर अमल क्यों नहीं हो सका??
क्या राज्य एवं केन्द्र की खुफिया तंत्र के बीच कोई तालमेल नहीं है??
जब भी इस तरह की घटना होती है उसके बाद कहा जाता है कि 'फाइट बैक' तो इसके सिवा किया भी क्या जा सकता है?? कहीं भी जिन्दगी चलाने के लिये पैसों की आवश्यकता होती है और वह तो घर बैठे मिल नहीं सकता।
तो 'फाइट बैक' की संकल्पना थोथी है ,मजबूरी है। काश्मीर में तो वर्षों से दहशतगर्दी का माहौल चल रहा है वहॉ क़ॆ लोगों के लिए हरेक दिन fight back ही तो है जो हमेशा कफन लेकर चलते हैं।
दीगर बात है कि अपने पड़ोसी देश के साथ बात चले ,सौहार्द्र की स्थापना हो इसमें बुरा क्या है??लेकिन क्या इसके आधार पर हम चैन की बंसी बजाने लगे तो यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए शोभा नहीं देता.

Wednesday, November 19, 2008

एम्स की एक रात

दो दिन पहले aiims(all इंडिया institute ऑफ़ मेडिकल science) जाना हुआ था क्योंकि मेरे एक अंकल को वहॉ पेसमेकर लगना था।जाते वक्त ऐसा नहीं सोचा था कि वहॉ रात को रूकना होगा फिर भी हाफ स्वेटर के साथ -साथ जैकेट भी डाल ही ली। वहॉ पहुंचने पर पता चला कि अंकल जी जो सुबह 10बजे वहॉ पहुंचे तब से लेकर शाम के चार बजे तक एक कुर्सी पर बैठकर इंतजार ही कर रहे हैं। खैर सरकारी अस्पताल में तो यह सब चलता ही है कि वहॉ हार्टॅ पेशेंट के लिए भी वेटिंग रूम नाम की चीज नहीं होती और दूसरा जब किसी स्टाफ से पूछे कि भई इतनी देर क्यों हो रही है तो वही घिसा पिटा सा जवाब कि इतनी जल्दी कहॉ!!!
खैर शाम के 5बजे उनका भी नम्बर आ गया। कुर्सी के बदले उन्हें अब एक स्ट्रेचर दे दिया गया क्योंकि वे तब तक काफी थक चुके थे. इसके बाद उन्हें ओ.टी. मे ले जाया गया जहॉ टेम्पररी पेस मेकर लगना था. इसी बीच हार्ट वार्ड़ से किसी के डेथ का समाचार मिला. ऐसा लगा कि सारी दुनिया कहीं रूक सी गई.
बस एक सेकेंड़ का ही फासला तो होता है जिंदगी और मौत के बीच । जब धड़कन है, श्वास है तब तक न जाने कितनी चीजें साथ-साथ और जब नहीं फिर तो................ । स्ट्रेचर पर उस बॉडी को कपड़े में लपेटकर ले जाया जा रहा था और मैं बस यही सोच रहा था कि जिंदगी का तो यही कटु सच है ।हम अपने पीछे केवल कर्मों को ही छोड़कर जाते बाकी सब का कोई मतलब नहीं.
लगभग शाम 8बजे तक अंकल जी को अब टेम्परेरी पेसमेकर लगा दिया गया था और उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया इसके बाद अब सारी रात जागते हुए मॉनिटर पर यह देखना था कि पल्स कैसी चल रही है। कुर्सी पर बैठे-बैठे लगभग रात के 2बज गये तब मेरे एक सीनियर की बारी आई और उन्होंने कहा कि जाओ बाहर जाकर लेट जाओ। बाहर कहॉ???? जी बिल्डिग़ से बाहर जहॉ छत नहीं है ,सड़क पर सोना है। उनके अनुसार अपनी हार्डनेस का परिचय देना था. ऐसा हॉस्टल में रैगिंग के वक्त होता था.
बस मैं चादर बिछाकर बाहर लेट गया यह सोचता हुआ कि पता नहीं कहीं ऐसा न हो कि कोई गाड़ी मेरे उपर न आ जाए। खैर सुबह 4.30 बजे फिर अंकल जी के पास गया. वो ठीक थे. अगले दिन उनका ऑपरेशन सफल रहा. आज फोन आया कि वो अब ठीक हैं
लेकिन एम्स में सड़क पर बिना छत के नीचे सोना बार-बार याद दिलाता है न जाने हमारे देश में कितने लोग ऐसे हैं जो सड़क पर वर्षों गुजार देते हैं, उन्हें पूछने वाला आखिर कौन है????

Sunday, November 16, 2008

मस्तमौला (कविता)

वो तो हमेशा
से वैसे ही रहे हैं
बेफिक्र,मस्तमौला,
समय के बदलते पल ने
उन्हें कभी नहीं बदला
चाहे वसंत हो,सर्दी हो या गर्मी
मानो
वही समय के बदलते हरेक पल
को
मुँह चिढ़ा रहे हों
कि देखो
तुम्हारे बदलने से,
हम जैसों
की दुनिया नहीं बदलती
जो अर्धनग्न,बिना किसी छत के
इस ठंड में
आई.एस.बी. टी. (दिल्ली)के
उस फ्लाईओवर पर लेटे हुए हैं....

Saturday, November 15, 2008

बढ़्ते फासले...(कविता)

ऐसा ही तो कहा था
कि
बस अभी-अभी आता हूं
मम्मी-पापा से
लेकिन
न जाने 'अभी-अभी' ने
कितना फासला बना दिया
कि वो जो सफर शुरू किया था
खत्म होने का नाम ही नहीं लेता
बार-बार पीछे की ओर
लौटना चाहता हूं,
और सोचता हूं कि खिलौने में भरी
चाबी की तरह
यह फासला भी खत्म हो जाए
लेकिन
इस महानगर की आपाधापी ने उलझा दिया है
मुझे
अभिमन्यु के चक्रव्यूह की तरह...

Wednesday, November 12, 2008

अंजामें गुलिस्तां क्या होगा?

आतंक ,आतंकी से जूझता हमारा देश ना जाने आज अपने किस निक्रिष्टतम रूप में जा रहा है जो हमने शायद कभी सोचा भी न हो। देश में चारों तरफ आतंक की घटनाऍ हो रही हैं और हरेक बार शक की सुई अपने पडोसी देश पर जाती तो कभी मुस्लिम आतंकवादी पर।
एक संवेदनशील नागरिक होने के कारण मेरे मन में भी हमेशा से यह प्रश्न उठता रहा कि आखिर क्यों प्रत्येक बार की आतंकी घटनाओं में मुस्लिम का ही नाम लिया जाता है? क्या सचमुच उन्हें इस देश से प्यार नहीं है? क्या सचमुच वे कुरान का आदर नहीं करते? क्या उनके लिए शांति एवं सुकून अन्य भारतीयों के लिए कोई मायने नहीं रखता?
इतना सब होते हुए भी मेरा मन कभी भी इसकी गवाही न दे पाया कि एक व्यक्ति के कारण या कुछ व्यक्तियों की गलत गतिविधियों के कारण उस पूरी कौम को क्यों उनके ही देश में कुछ वर्गों द्वारा गलत नजरिए से देखा जा रहा है?
लेकिन हाल ही में मालेगॉव विस्फोट का जो सच सामने आया है शायद उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थीकि एक सेना का ऑफिसर कैसे इस तरह के कार्यों में लिप्त हो सकता है?
हैरानी यह देखकर नहीं हुई कि उस विस्फोट में हिन्दू संगठन भी शामिल था क्योंकि जो आस्था के साथ खिलवाड क़र सकते हैं वो किसी से भी खिलवाड कर सकते । इसका उदाहरण हाल के दिनों में विभिन्न प्रवचन देने वाले बाबाओं की निक्रिष्टतम कार्यों में संलिप्तता से ही जाहिर होता है।
हैरानी तो तब होती है जब उनके संरक्षण के लिए मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियां भी सामने आती है और जॉच में व्यवधान डालने का कार्य करती है. यहॉ तक की गोरखपुर के सांसद जो अपने -आपको बाबा भी कहते हैं(?) उनका भी नाम इसमें लिया जा रहा है लेकिन एक सांसद की कानून एवं संसद के प्रति जो जिम्मेदारी होती है उसका तो पालन उन्होंने नही ही किया कि वे जॉच एजेंसी को सहयोग देते बल्कि उन्हें सारा कुछ राजनीति से प्रेरित ही लगता है. आगे वे ये धौंस भी देते हैं कि हिम्मत है तो गिरफ्तार करके देखो. क्या वे इसे एक कम्यूनल एजेंडे का रूप देना चाहते हैं?टी.बी. पर बोलते हुए उन्होनें तो सारी मर्यादा को ही ताक पर रख दिया।
समय आ गया है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक को ही इस दिशा में कदम उठाना होगा कि वे किस प्रकार के प्रतिनिधि को अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए संसद मे भेजे।
एक बात तो मन में आती है यह सब देखकर ---------
एक ही उल्लू काफी है बर्बादे गुलिस्तां करने को
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामें गुलिस्तां क्या होगा?
आज मन व्यथित है। इसलिए नहीं कि कोई हिन्दू संगठन आतंकी गतिविधि में शामिल है बल्कि इसलिए कि जिस समुदाय पर सदा से ऊंगली उठती रही है उसकी ऑखों का सामना कैसे करूंगा? आज वो समुदाय खामोश है, उसकी खामोशी की चीत्कार को कैसे सहूं? उनके अपमान की भरपाई कैसे कर सकूंगा?मैं तो नि:श्ब्द हूं ,आप ही कुछ कहें!!!